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VOL. 12, ISSUE 1 (2026)
बाह्य ऋण और सहायता के प्रकार: एक विस्तृत अध्ययन
Authors
ज्ञानेन्द्र सिंह, डॉ. गीता सिंह
Abstract
जैसा कि पूर्व में हमने देखा कि विदेषी सहयोग या तो रियायती सहायता के रूप् में प्राप्त होती है अथवा गेैर रियायती सहायता या विदेशी निवेश के रूप में प्राप्त होती है रियायती सहायता या विदेशी निवेश के रूप् में प्राप्त होती है।रियायती सहायता में अनुदान और कम ब्याजदरों व लम्बी भुगतान अवधि वाले ऋण सम्मिलित होते है।
प्रो0 नर्कसे ने अपनी पुस्तकश्ज्ीम च्तवइसमउ व िब्ंचपजंस वितउंजपवद पद न्दकमअमसवचमक बवनदजतपमेश्में विदेषी सहयोग के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किये है। प्रो0 नर्कसे का कहना है कि भूतकाल में विकासशील देशों में अर्थिक विकास को गतिशील बनाने में विदेषी सहयोग का बहुत कम हाथ रहा है और जो भी विदेशी सहातया आयी है, वह प्राथमिक उत्पादन तक ही सीमित रही है, किन्त ुनर्कसे का मत है कि उपर्युक्त सहायता का प्रवाह, औद्योगिक रूप से विकसित देशों को सचेत नियोजन का परिणाम नही था अर्थात् यह उन्होंने पिछड़े देशों की मदद के लिए नहीं किया थावरन् यह तो निजी लाभ के उद्देश्य से किया था।
भारत की राष्ट्रीय नीति ने विदेशी सहयोग की आवश्यकता को स्वीकार तो किया, लेकिन इसे सीमित भूमिका देने का निर्णय लिया।इसी कारण विदेषी सहयोग को अधिकतम 49 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी तक सीमित रखा गया, जबकि भारतीय साझेदारों को प्रमुख हिस्सेदारी रखने की अनुमति दी गई।इसके अलावा विदेशी कंपनियों को केवल प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में ही प्रवेश की अनुमति प्रदान की गई।समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी सहयोग को लेकर भारत की नीति नियंत्रित, प्रतिबंधात्मक और चयनात्मक रही
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Pages:35-38
How to cite this article:
ज्ञानेन्द्र सिंह, डॉ. गीता सिंह "बाह्य ऋण और सहायता के प्रकार: एक विस्तृत अध्ययन". National Journal of Advanced Research, Vol 12, Issue 1, 2026, Pages 35-38
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