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VOL. 11, ISSUE 2 (2025)
हिंदी साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद की विकास-परंपरा: प्रेमचंदोत्तर कथा-संवेदना तथा समकालीन सामाजिक संदर्भों का समीक्षात्मक विश्लेषण
Authors
विशाल प्रताप मित्र
Abstract
हिंदी साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद की परंपरा भारतीय समाज के बहुस्तरीय अनुभवों, संरचनात्मक विषमताओं तथा ऐतिहासिक परिवर्तनों का सटीक एवं संवेदनशील प्रतिबिंब प्रस्तुत करती है। प्रस्तुत लेख प्रेमचंद से लेकर समकालीन कथा-लेखन तक यथार्थवादी प्रवृत्तियों के विकास, परिवर्तन के साथ ही विविध आयामों का समीक्षात्मक विश्लेषण का प्रयत्न करता है। प्रेमचंद द्वारा आरंभ की गई यथार्थवादी दृष्टि जिसमें ग्रामीण जीवन, वर्ग-संघर्ष, जाति-असमानता, स्त्री-स्थिति के साथ ही समकालीन सामाजिक न्याय की व्यापक संवेदनाएँ निहित थीं ने हिंदी कथा-साहित्य हेतु वह आधार निर्मित किया जिस पर प्रगतिवाद, नई कहानी, दलित लेखन और उत्तर-आधुनिक कथा धाराएँ विकसित हुईं। इस लेख में पहले प्रगतिशील कथा-साहित्य के वैचारिक आग्रहों का विवेचन किया गया है जिसमें श्रम, शोषण, औपनिवेशिकता, जनवाद एवं समाजवादी आदर्शों आदि के माध्यम से यथार्थवाद का तीक्ष्ण विस्तार दिखाई देता है। इसके बाद नई कहानी आंदोलन के अंतर्गत उभरे मनोवैज्ञानिक और शहरी यथार्थ पर चर्चा की गई है जिसमें मध्यमवर्गीय जीवन, संबंध-संकट, अस्तित्ववादी अनुभवों तथा व्यक्तिक संघर्षों का प्रामाणिक चित्रण मिलता है। समकालीन कथा-साहित्य में यथार्थ का परिदृश्य और भी जटिल हुआ है जिसमें उदारीकरण, वैश्वीकरण, डिजिटल संस्कृति, पहचान-राजनीति, जातीय हिंसा, लैंगिक विविधता, प्रवसन और शहरी असुरक्षा जैसे नए सामाजिक तत्व शामिल हुए हैं। इसी प्रकार दलित तथा स्त्री-विमर्शात्मक लेखन ने सामाजिक यथार्थवाद को अनुभववादी, प्रतिरोधात्मक और अस्मितामूलक आयाम प्रदान किए जिससे हाशियाकृत जीवन-विश्व केंद्र में आया। इस लेख का निष्कर्ष यह रेखांकित करता है कि सामाजिक यथार्थवाद न केवल साहित्य को समाज से जोड़ने वाला माध्यम है अपितु वह निरंतर बदलती सामाजिक संरचनाओं को समझने और आलोचनात्मक रूप से व्याख्यायित करने की एक जीवंत पद्धति भी है जो समकालीन संदर्भों में और अधिक प्रासंगिक होती जा रही है।
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Pages:53-58
How to cite this article:
विशाल प्रताप मित्र "हिंदी साहित्य में सामाजिक यथार्थवाद की विकास-परंपरा: प्रेमचंदोत्तर कथा-संवेदना तथा समकालीन सामाजिक संदर्भों का समीक्षात्मक विश्लेषण". National Journal of Advanced Research, Vol 11, Issue 2, 2025, Pages 53-58
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