National Journal of Multidisciplinary Research and Development

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Vol. 6, Issue 1 (2021)

त्रिशूल उपन्यास में अभिव्यक्त साम्प्रदायिकता का दंश


संदीप त्रिपाठी

हमारे देश में धर्म की जड़े बहुत गहरी है। जिसने लोगों को अपने मायारूपी जाल में कुछ इस तरह जकड़ कर रखा है कि, वह जितना उस दलदल से बाहर निकलने की कोशिश करते है, उतना अधिक उसमे फंसते चले जाते है। भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है जहाँ सब जाति,धर्म आदि के लोगों को समान रूप से जीने का अधिकार है। हालांकि भारतीय संविधान लागू होने के बावजूद भारत के जाति और धर्म निरपेक्ष राज्य बन गया,पर साम्प्रदायिकता की समस्या आज भी ज्यों की त्यों बनी हुई है। लेकिन हमारे समाज में कुछ असमाजिक तत्वों और अराजकतावादियों ने धर्म को अपने स्वार्थ के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया है। जिसका परिणाम लोगों को सदैव अपनी जान से चुकाना पड़ता है। इतने घातक परिणाम होने के पश्चात भी सम्पूर्ण मानव जाति का झुकाव धर्म की और बढ़ता ही गया है। जबकि मानव सभ्यता की शुरुआत से ही भारतीय संस्कृति की परम्परा "अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम् ।।" अर्थात 'यह मेरा है अथवा पराया है ऐसा केवल छोटे दिल वाले ही सोचते हैं । उदार दिल वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही एक परिवार की तरह है।' की रही है। आम जन जीवन में साम्प्रदायिकता किसी त्रासदी से कम नही है। त्रासदी ऐसी कि, जो जन्मों जन्मांतर तक मनुष्य के उपर ऐसी छाप छोड़ जाती है, जिससे बाहर निकलना मुत्यु के पश्चात् ही संभव हो पाता है। मनुष्य का धर्म से लगाव ही उसे विवेकशून्य होकर अन्धविश्वासी बनाता है। जो एक आम जन जीवन में त्रासदी का कारण बनता है। समय समय पर हुई साम्प्रदायिकता के वीभत्स रूप ने हिंदी के साहित्यकारों को भी हिला कर रखा है। जिसका यथार्थ चित्रण करने में साहित्यकारों ने कोई परहेज नहीं किया।
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