National Journal of Multidisciplinary Research and Development

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Vol. 6, Issue 1 (2021)

20 वीं सदी के दो महानायक- प्रेमचंद और महात्मा गाँधी


पूनम रानी

साहित्य समाज का एक अभिन्न हिस्सा रहा है। जो समाज की हर छोटी से लेकर बड़ी घटनाओं को अपने में समेटता चलता है। इसलिए साहित्य को समाज का दर्पण भी कहा जाता है। समय समय पर अनेक लोगो ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ शोषितों की आवाज को बुलंद करने के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया तथा अपनी एक अलग राह का चयन किया। उनमें से 20वीं सदी के दो प्रमुख महापुरुषों प्रथम साहित्य के क्षेत्र में प्रेमचंद्र और दूसरा राजनीति के क्षेत्र में महात्मा गांधी का नाम सर्वोपरि है। जिस दौर में प्रेमचंद ने अपनी साहित्य यात्रा की शुरुआत की लगभग उसी समय के आसपास महात्मा गाँधी जी का आगमन भी भारतीय राजनीति में हुआ था। उस दौर में भारत की आर्थिक,सामाजिक और राजनीतिक स्थिति बहुत ही दयनीय थी। जहां एक ओर भारत के उपर औपनिवेशिक शक्ति का शासन था। वहीं दूसरी ओर पूंजीपति तथा साहूकार अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए गरीब किसानों का खून चूसने में लगे हुए थे। इन सबको समाज में व्याप्त सामजिक कुरीतियों से निजात दिलाने के लिए प्रेमचंद ने साहित्य की डोर को पकडकर अपने लेखन में समाज की हर एक कुरीतियों का चित्रण किया है। जिन समस्याओं से उस दौर का समाज गुजर रहा था। समाज को दर्पण दिखाने का जो काम प्रेमचंद ने किया, वो वाकई में काबिले तारीफ़ है। हिंदी साहित्य के इतिहास में गरीबों, पिछड़ों और दलितों के जीवन की आवाज़ को बुलंद करने का श्रेय प्रेमचंद को ही जाता है। प्रेमचंद ही वो पहले उपन्यासकार रहें है जिन्होंने हिंदी साहित्य में आज़ादी के लिए आवाज़, प्रगतिशीलता, उपनिवेशवाद का विरोध, ब्राह्मणवाद और सामंती समाज का विरोध, जातिवाद और छुआछूत का विरोध करने की परंपरा की शुरुआत की। वहीँ दूसरी ओर महात्मा गांधी जी ने सत्याग्रह और राजनीति की डोर का सहारा लेते हुए समाज में अपनी सक्रिय भूमिका अदा कि। जिस तरह गांधी जी ने सत्य, अहिंसा और इमानदारी के मार्ग में चलकर भारतीय समुदाय के लोगों के नागरिक अधिकारों के लिए संघर्ष हेतु सत्याग्रह करना शुरू किया। उसी तरह 'कलम का जादूगर' कहे जाने वाले प्रेमचंद्र ने गांधी जी के आदर्शों को पूरी तरह निभाया और अपने लेखन में उन सभी घटनाओं का सत्यतापूर्वक यथार्थ चित्रण किया जिन कुरीतियों से समाज का हर एक वर्ग ग्रसित था। प्रेमचन्द्र का मानना था कि जब तक साहित्य में तरक्की नहीं होगी, तब तक साहित्य,समाज और राजनीति सबके सब ज्यों के त्यों पड़े रहेंगे।
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