National Journal of Multidisciplinary Research and Development

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Vol. 5, Issue 3 (2020)

ब्रिटिश राज्य के विरूद्ध भारत में बिरसा-आंदोलनः एक अध्ययन


सुजीत कुमार

आदिवासी इलाकों में बाहरी लोगों और औपनिवेशिक राज की घुसपैठ ने उनकी पूरी सामाजिक व्यवस्था को ही उलट-पलट दिया। उनकी जमीन उनके हाथ से निकलती गई और वे धीरे-धीरे किसान से खेत मजदूर होते चले गए। जंगलों से उनके गहरे रिश्ते को भी औपनिवेशिक हमले ने तोड़ दिया। इसके पहले वे भोजन, ईंधन और पशुओं का चारा आदि जंगलों से जुटाते थे, जहां उनका जीवन पूरी तरह स्वच्छंद था। खेती के उनके अपने तरीके थे। वे जगह बदल-बदल कर ‘झुम‘ और ‘‘पडु‘ विधियों से खेती करते थे-यानी जब उन्हें लगता था कि उनके खेत अब उपजाऊ नहीं रह गए हैं, तो वे जंगल साफ कर खेती के लिए नई जमीन तैयार कर लेते थे। लेकिन औपनिवेशिक राज ने सब-कुछ बदल दिया और जंगली भूमि, वन-उत्पादों व गांवों की जमीन के इस्तेमाल पर भी तरह-तरह के अंकुश लगा दिए। जगह बदलकर की जाने वाली खेती पर तो पूरी तरह रोक लगा दी गई। पुलिस और अन्य छोटे-मोटे अधिकारियों द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों, शोषण और जबरन उगाही ने आदिवासियों का जीना दूभर कर दिया। लगान वसूलने वाले लोग और महाजनों-जैसे सरकारी बिचैलिए और दलाल इन आदिवासियों का शोषण तो करते ही थे, उनसे जबरन बेगार भी कराते थे। रही। बिरसा विद्रोह के एक प्रतीक एवं संघर्ष के प्रेरणा-स्त्रोत के रूप में कायम रहे। छोटा नागपुर के सभी आंदोलनों ने बिरसा की दुहाई की। भूमि-अन्तरण, उद्योगीकरण और भारी परिवर्तनों के संदर्भ मे एक विषिष्ट किस्म के मुंडा राज्य और धर्म-स्थापना की सम्भावना तथा परिवर्तन लाने के लिए उग्र साधनों की धारणा भले ही क्षीण मानी जाए, लेकिन क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक के रूप में बिरसा और उनके आंदोलन को मान्यता मिल चुकी है।
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