National Journal of Multidisciplinary Research and Development

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Vol. 5, Issue 2 (2020)

उच्च प्राथमिक विद्यालयों की छात्राओं के पारिवारिक वातावरण एवं अनुषासन का उनके भावी-जीवन पर प्रभाव का अध्ययन


मंजू शर्मा, आसमा खातून

बदलते परिवेश के इस वातावरण में अधिकांश परिवार अब इस बात को समझने लगे हैं कि बालिकाओं को पराश्रित नहीं छोड़ा जा सकता, उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने में भरसक प्रयास करना ही होगा, क्योंकि बालक की प्रथम पाठशाला उसके ‘परिवार’ को ही माना जाता है। जहाँ वह अपने परिजनों की छाया में बैठकर अपनी सुसुप्त क्षमता व प्रतिभा को उजागर करता है। शिशु को पहली बार माँ के दुुुलार और पिता के स्नेह का आभास उनकी गोद में ही हो जाता है। अतः उसके परिजनों को अपने कार्य व्यवहार से बालक का उचित पोषण करना आवश्यक हो जाता है, जिससे वह उत्तम भविष्य के सोपानों पर अग्रसर हो सके। परिवार में रहकर जहाँ बालक कत्र्तव्य पालन का पाठ सीखता है वहीं उसके नैतिक गुणों का भी विकास होता है। आज का बालक कल का नागरिक होता है। अतः उसके भावी-जीवन को उत्तम कोटि का बनाने में सहयोग की वृत्ति, सहिष्णुता, नैतिकता, उदारता, सदाशयता, अनुशासन, निष्ठा तथा सम्मान भावना और अन्य मानवीय मूल्यों को जीवन का आधार बनाने की आवश्यकता है और इन सारे संस्कारों का आविर्भाव उसके पारिवारिक मृदु वातावरण एवं संयमित अनुशासन से ही सम्भव है, तभी उसका भावी जीवन सुखद और सफल हो सकेगा।
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