National Journal of Multidisciplinary Research and Development

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Vol. 6, Issue 4 (2021)

रीतिकालीन कविता में नीति कवियों की काव्यात्मकता


दीपाली

नीतिकाव्य की दृष्टि से रीतिकाल अपने नैतिक आदर्शों के लिए अधिक महत्त्वपूर्ण है। इस काल में आकर नीति जैसे नियम को स्वतंत्र रचना के अंतर्गत व्यापकता और विविधता के साथ प्रस्तुत किया गया है। रीतिकालीन नीति कवियों में गिरिधर कविराय अपनी कुंडलियों, दीनदयाल अपनी अन्योक्तियों, घाघ और भड्डरी कृषि सम्बन्धी तथा ज्योतिष सम्बन्धी कहावतों, बैताल अपनी विनोक्तियों और विरोधी तथ्यों तथा वृन्द अपनी सतसई के कारण प्रख्यात हुए हैं। नीति को साथ लेकर चलते हुए जहाँ एक ओर ये रीतिकालीन कवि समाज में व्यवहृत आचरण और व्यवहार पर चिंता जाहिर करते हैं वहीं मनुष्य को विद्या, धन, सत्संगति, कर्म, आदि का महत्त्व बताते हुए उन्हें उचित मार्ग पर चलने की नीति भी सिखलाते हैं। व्यवहार की वह रीति जो इस स्वार्थ सिद्धि और अतिआधुनिकता की दौड़ में आवश्यक बन पड़ती है उसे भी रीतिकाल के ये नीति कवि सरल शब्दों में कुंडलियाँ, छप्पय, दोहा, आदि छंदों के माध्यम से सिखाने का प्रयास करते दिखाई पड़ते हैं।
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How to cite this article:
दीपाली. रीतिकालीन कविता में नीति कवियों की काव्यात्मकता . National Journal of Multidisciplinary Research and Development. 2021; 6(4): 5-8.